How to overcome labor and delivery complications? Tips in Hindi – लेबर और डिलीवरी की समस्याओं से निजात पाने के तरीके

जैसे जैसे लेबर और डिलीवरी का समय नज़दीक आता जाता है, काफी स्थिर और अंदर से मज़बूत महिलाएं भी काफी चिंता और भय से ग्रस्त हो जाती हैं। यह समय उत्सुकता, आशा और एक तरह के अनजाने भय से भरा हुआ होता है। पर इनमें से कुछ चिंताएं वास्तविक भी होती हैं।

लेबर और डिलीवरी के दौरान होने वाली समस्याएं (Complications during labor and delivery)

आखरी चरण तक गर्भावस्था के समय के अच्छे से कट जाने के बावजूद डिलीवरी के समय आपको कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

डिलीवरी ऑपरेशन – समय से पहले डिलीवरी (Premature delivery)

यह बच्चे के लिए काफी खतरे की घड़ी होती है, क्योंकि उसका पूरा विकास होने के पहले ही उसका जन्म हो जाता है। 37 हफ़्तों के पहले बच्चे के जन्म को प्रीमैच्योर (premature) डिलीवरी कहते हैं। इस स्थिति में फेफड़ों में सांस लेने की क्षमता काफी कम होती है और सांस लेने में काफी दिक्कतें पेश आ सकती हैं। पाचन क्रिया भी इस समय ठीक से काम नहीं करती।

जुड़वा बच्चों के जन्म के समय देखभाल के तरीके

लेबर की अवधि का बढ़ना (Prolonged labor)

लम्बे समय तक लेबर होने से माँ और बच्चे दोनों के लिए ही समस्या खड़ी हो सकती है। अगर एमनियोटिक सैक (amniotic sac) लम्बे समय तक प्रभावित रहता है तो कई प्रकार के इन्फेक्शंस (infections) की भी काफी संभावना रहती है।

बच्चे का गर्भ में सही मुद्रा में न रहना (Abnormal presentation)

ऐसी स्थिति बच्चे के लिए हानिकारक हो सकती है। जन्म के समय की सामान्य मुद्रा के अंतर्गत बच्चे का सिर नीचे की तरफ माँ की पीठ की ओर की दिशा में होता है और इसी मुद्रा में यह गुप्तांग से बाहर खुद को धकेलने का प्रयास करता है।

कुछ बच्चों का पैर नीचे की तरफ होता है। इसे ब्रीच प्रेजेंटेशन (breach presentation) कहते हैं जो कई प्रकार के होते हैं

  • फ्रैंक ब्रीच (frank breach), जिसमें बच्चे का पृष्ठ भाग (buttocks) पेल्विस की ओर सबसे आगे रहता है। सम्पूर्ण ब्रीच मुद्रा तब होती है, जब कोहनियां और हिप्स मुड़े रहते हैं और पैर बर्थ कैनाल (birth canal) में प्रवेश करते हैं।
  • अधूरा ब्रीच प्रेजेंटेशन (incomplete breach presentation), जिसमें एक या दोनों पैर आगे की ओर होते हैं।
  • ट्रांसवर्स ब्रीच (transverse breach) ऐसी मुद्रा होती है, जिसके अंतर्गत बच्चा हॉरिजॉन्टल (horizontal) अवस्था में गर्भाशय में लेटा होता है और उसका कंधा आगे की तरफ होता है।

लेबर और डिलीवरी की सामान्य समस्याएं (Common labor and delivery complications)

पीरियड्स के एक दिन बाद गर्भवती होने की संभावना

लेबर के दौरान गर्भाशय में बच्चे को घेरकर रखने वाला मेम्ब्रेन (membrane) टूट जाता है और इससे एमनियोटिक द्रव्य (amniotic fluid) बाहर निकलता है। यह स्थिति बच्चे के जन्म के तुरंत पहले या लेबर के दौरान भी उत्पन्न हो सकती है। समय से पहले मेम्ब्रेन के टूट जाने का मतलब है कि ये मेम्ब्रेन गर्भावस्था के काफी शुरूआती समय में ही टूट गयी है, जिसका अर्थ लेबर शुरू होने से पहले टूटना भी है। ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने से बच्चे के संक्रमित होने का ख़तरा काफी ज़्यादा मात्रा में बढ़ जाता है।

डिलीवरी होते हुए अम्बाइलिकल कॉर्ड प्रोलैप्स (Umbilical cord prolapse)

यह आपके बच्चे का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं तथा इसे उसकी जीवनरेखा भी कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अम्बाइलिकल कॉर्ड और प्लेसेंटा (placenta) ऐसे भाग हैं, जहाँ से आप अपने बच्चे के शरीर में ऑक्सीजन (oxygen) तथा अन्य पोषक पदार्थों का संचार करती हैं। पानी के टूट जाने पर यह गर्भाशय ग्रीवा (cervix) से फिसलकर निकल जाता है तथा बच्चे से पहले बर्थ कैनाल (birth canal) में पहुँच जाता है। यह कॉर्ड महिलाओं के गुप्तांग (vagina) से भी निकल सकता है, जो कि काफी खतरनाक स्थिति है, क्योंकि अम्बाइलिकल कॉर्ड से रक्त का संचार होता है और यह पूरी तरह रूक सकता है। अगर यह कॉर्ड बर्थ कैनाल में प्रोलैप्स हो जाता है तो आप इसे महसूस कर सकती हैं, और अगर यह आपके गुप्तांग से निकलता है तो इसे देखा भी जा सकता है।

अम्बाइलिकल कॉर्ड कम्प्रेशन (Umbilical cord compression)

क्योंकि भ्रूण गर्भाशय में हिलता डुलता और इधर से उधर होता रहता है, अतः अम्बाइलिकल कॉर्ड गर्भावस्था के समय के दौरान कई बार बच्चे के चारों तरफ लिपटकर छूटता रहता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि यह कॉर्ड ज़्यादा मुड़ जाता है और बच्चे को भी काफी नुकसान पहुंचा सकता है। यह काफी अनूठी तथा हज़ारों में से एक बार होने वाली स्थिति है तथा इसे रोकना भी बिलकुल संभव नहीं है। कई बार लेबर के समय अम्बाइलिकल कॉर्ड खिंचता एवं सिकुड़ता रहता है। इससे भ्रूण तक संचारित होने वाले रक्त के बहाव में काफी कमी आ जाती है और भ्रूण के दिल की धड़कनों में हलकी सी गिरावट भी देखी जा सकती है। इस स्थिति को वेरिएबल डीसीलियरेशन्स (variable decelerations) कहा जाता है।

परिवार नियोजन, एवं दूसरी गर्भावस्था का सही समय

एमनियोटिक फ्लूइड एम्बोलिस्म (Amniotic fluid embolism)

इस स्थिति में एमनियोटिक द्रव्य, जो कि गर्भाशय में भ्रूण को चारों ओर से घेरे रहता है, की थोड़ी सी मात्रा माँ के रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाती है। ऐसी स्थिति खासतौर पर तब उत्पन्न होती है जब माँ काफी थका देने वाले एवं मुश्किल लेबर से गुज़र रही हो। यह द्रव्य फेफड़ों में चला जाता है और इसकी धमनियों को सिकुड़ने पर मजबूर कर देता है। इससे दिल की धड़कन काफी तेज़ी से बढ़ने, दिल के धड़कने में असमानता, मूर्छा, झटका, दिल का दौरा तथा मृत्यु भी हो सकती है।

प्रीइक्लेम्पसिया (Preeclampsia)

यह गर्भावस्था की वो गंभीर समस्या है, जिसके अंतर्गत गर्भधारण के 20 हफ़्तों के बाद उच्च रक्त चाप (high blood pressure) की समस्या सामने आती है। प्रीइक्लेम्पसिया से ग्रस्त होने के फलस्वरूप कई समस्याएं हो सकती हैं जैसे गर्भाशय से प्लेसेंटा का समय से पहले अलग होना, मैटरनल सीज़र (maternal seizure) या दौरा पड़ना।

प्रसव के संकेत – गर्भाशय से रक्तस्त्राव (Uterine bleeding)

कई बार बच्चे के जन्म ले लेने के बाद महिलाएं पाती हैं कि उनके गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा (cervix) या गुप्तांगों से अत्याधिक मात्रा में खून निकल रहा है। इस स्थिति को पोस्टपार्टम हैमरेज (postpartum hemorrhage) कहा जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब डिलीवरी के बाद गर्भाशय की दीवार से अलग हुए प्लेसेंटा से खून निकलता रहता है, जिसकी वजह से गर्भाशय खुद को अच्छे से सिकोड़ नहीं पाता  और रक्त की धमनियों से स्त्राव होने लगता है। यह स्थिति गर्भाशय या गुप्तांग में लगी चोट या घाव की वजह से उत्पन्न हो सकती है।

पोस्ट टर्म प्रेगनेंसी (Post term pregnancy)

यूरिनरी ट्रैक्ट के इन्फेक्शन के कारण, लक्षण और उपचार

पोस्ट टर्म गर्भावस्था की स्थिति 41 से 42 हफ़्तों के बाद उत्पन्न होती है और इससे काफी परेशानियां भी पैदा होती हैं। यह परेशानी तब उत्पन्न हो सकती है जब प्लेसेंटा बच्चे को स्वस्थ और पोषित बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पोषक पदार्थ उपलब्ध नहीं करवा पाता।

प्रसव का सही समय – लेबर और डिलीवरी के दर्द को नियंत्रित करना (Facing labor and delivery fears – control of pain, prasav ke lakshan)

डिलीवरी के दर्द को सहन करने योग्य बनाने के लिए कुछ दवाइयाँ उपलब्ध हैं। ये दवाएं सुरक्षित हैं और इनका बच्चे पर कोई ख़ास असर नहीं होता। इसके प्रभाव से बच्चे को जन्म के बाद काफी रहता है और वह सोता रहता है।

सही समय पर सही प्रकार सांस लेने से भी दर्द काफी कम होता है। इसे सीखने के लिए बच्चे के जन्म से पहले की उन क्लासेज़ (parental classes) में भाग लें, जहां लेबर के दौरान सांस लेने की कला के बारे में सिखाया जाता है।

एक पेशेवर लेबर सपोर्ट (labor support) टीम भी लेबर का दर्द रोकने में काफी सहायक साबित हो सकती है। यह सपोर्ट किसी रिश्तेदार, नर्स या दोस्त से मिल सकता है।

सिजेरियन ऑपरेशन – एपीड्यूरल का भय (Labor and delivery : Fear of an epidural)

एपीड्यूरल (epidural) एक ऐसी प्रक्रिया है जो लेबर का दर्द कम करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। कई महिलाएं एपीड्यूरल (epidural) की प्रक्रिया और इसके साइड इफेक्ट्स (side effects) के बारे में सोचकर काफी चिंतित रहती हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि इस प्रक्रिया के दौरान होने वाले कॉम्प्लिकेशन्स (complications) लम्बे समय तक नहीं रहते। जो समस्यायें कुछ दिनों तक रहती हैं, उनमें सिर का दर्द तथा रीढ़ की हड्डियों का दर्द प्रमुख है।

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सिजेरियन डिलीवरी – सी सेक्शन का भय (Delivery ke samay: Fear of a c-section)

सीज़ेरियन (cesarean) पद्दति से डिलीवरी का चुनाव करना एक माँ के हाथ में होता है। पर फिर भी ज़्यादातर महिलाएं इस प्रक्रिया से डरती हैं और किसी भी तरह इससे बचना चाहती हैं। महिलाओं को एक बार सीज़ेरियन पद्दति से डिलीवरी के बाद पूरी तरह ठीक होने की समय सीमा के बारे में भी काफी तनाव रहता है।

सीज़ेरियन पद्दति से डिलीवरी में खतरे की आशंका काफी कम होती है। डॉक्टर्स इस पद्दति का प्रयोग करने की सलाह तभी देते हैं, जब माँ या बच्चे के स्वास्थ्य को सामान्य डिलीवरी की स्थिति में कोई ख़तरा हो।

बिना तय योजना के तहत की गयी सीज़ेरियन डिलीवरी का एक मुख्य कारण यह होता है कि या तो बच्चा काफी बड़ा होता है, या फिर गर्भाशय में बच्चे की मुद्रा सही नहीं होती। सर्विक्स (cervix) के पूरी तरह डाइलटेड (dilated) ना होने की स्थिति में भी सीज़ेरियन पद्दति से डिलीवरी करनी पड़ सकती है।

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