What are the causes of getting diabetes during pregnancy – Diabetes in pregnancy will affect the baby? – गर्भावस्था के दौरान मधुमेह होने के कारण

जेस्टेशनल डायबिटीज एक ख़ास तरह का मधुमेह है  जिसकी शिकार एक महिला तभी होती है जब वह गर्भवती होती है। इस तरह के मधुमेह का मुख्य कारण महिलाओं के शरीर में गर्भावस्था की प्रक्रिया के दौरान होने वाले हार्मोनल परिवर्तन हैं। महिलाएं अपनी गर्भावस्था के समय हार्मोनल इन्सुलिन से काफी प्रभावित होती हैं गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अपने शरीर में ज़्यादा मात्रा में इन्सुलिन का संचार महसूस करती हैं जिसे ब्लड ग्लूकोस के नाम से भी जाना जाता है।

एक शोध के मुताबिक़ आज के दौर में 18% से भी ज़्यादा महिलाएं इस जेस्टेशनल डायबिटीज से पीड़ित होती हैं। यह काफी आवश्यक है कि हर गर्भवती महिला इसका इलाज करवाए जिससे कि कोई समस्या न खड़ी हो और बच्चा इस समस्या की चपेट में ना आए।

गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य – गर्भावस्था के दौरान मधुमेह के कारण (Causes of diabetes during pregnancy)

जब एक गर्भवती महिला भोजन करती है तो उसकी पाचन प्रक्रिया ज़्यादातर खाने को ग्लूकोस के रूप में तोड़ती है। यह चीनीयुक्त ग्लूकोस रक्त में जाता है और सेल को इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने का अवसर मिल जाता है। यह सारी प्रक्रिया रक्त वाहिनियों में ग्लूकोस के मौजूद होने की वजह से होती है। पर समस्या तब होती है जब उनका शरीर पर्याप्त मात्रा में इन्सुलिन का उत्पादन करने में असमर्थ साबित होता है। कई बार शरीर के सेल्स (cell) भी इन्सुलिन के साथ प्रतिक्रिया नहीं कर पाते। मधुमेह का एक और कारण आपके रक्त में ग्लूकोस की अतिरिक्त मौजूदगी का होना हो सकता है। यह ग्लूकोस आपका शरीर ऊर्जा में परिवर्तित नहीं कर पाता।

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गर्भावस्था के दौरान भी महिलाओं के अंदर हार्मोनल परिवर्तन होने के कारण शरीर के सेल्स इन्सुलिन के साथ प्रतिक्रिया नहीं कर पाते। कई गर्भवती महिलाओं को यह समस्या नहीं होती क्योंकि अगर ग्लूकोस इन्सुलिन के उत्पादन में असमर्थ है तो पाचक ग्रंथि (pancreas) शरीर को इन्सुलिन के उत्पादन में मदद करती है। पाचक ग्रंथि का एक और काम इन्सुलिन की बढ़ती मांग को पूरा करना होता है। पर अगर यह कार्य नहीं होता है तो आपके शरीर के रक्त में ग्लूकोस की मात्रा काफी बढ़ जाती है। इन सबका मुख्य कारण जेस्टेशनल डायबिटीज ही होता है। जैसे ही बच्चे का जन्म होता है, ज़्यादातर महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटीज के प्रभाव से मुक्त हो जाती हैं।

बच्चे पर मधुमेह का प्रभाव (Effect of diabetes in baby)

गर्भावस्था के समय मधुमेह की शिकार ज़्यादातर महिलाएं किसी न किसी प्रकार से अपने साथ अपने बच्चे को भी प्रभावित करती हैं। आप अपने नवजात शिशु को मधुमेह के प्रभावों से दूर रखने के लिए अपने खानपान की आदतों में थोड़ा सा परिवर्तन अवश्य कर सकती हैं। अगर आपके शरीर में मौजूद ग्लूकोस ठीक से नियंत्रित नहीं है तो इससे बच्चे पर काफी खराब प्रभाव पड़ सकता है।

मधुमेह आहार, अगर आपके शरीर में मौजूद ग्लूकोस का स्तर ज़्यादा है तो इससे आपके बच्चे के शरीर के रक्त में भी काफी मात्रा में ग्लूकोस का संचार हो जाता है। अतः इस समय यह काफी आवश्यक हो जाता है कि आपके नवजात शिशु की पाचक ग्रंथि ज़्यादा इन्सुलिन पैदा करे जिससे फिर से अतिरिक्त ग्लूकोस का उत्पादन हो। अतः आपके बच्चे के शरीर में मौजूद अतिरिक्त ब्लड शुगर उसके शरीर का वज़न भी काफी बढ़ा देता है। आपके बच्चे के शरीर का यह अतिरिक्त वज़न शरीर के ऊपरी हिस्से में ज़्यादा देखा जाता है।

गर्भावस्था में देखभाल, अगर माँ को मधुमेह की शिकायत हो तो बच्चे को भी मैक्रोसीमिया की समस्या घेरेगी। यह एक ऐसी स्थिति है जब बच्चे का आकार काफी बड़ा हो जाता है और वह गर्भ नलिका (birth canal) में प्रवेश नहीं कर पाता। इस नलिका से बाहर आते समय बच्चे का कंधा भी कई बार अटक जाता है। इस स्थिति को शोल्डर डिस्टोकिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति के दौरान सर्जन को ख़ास प्रक्रिया की मदद से बच्चे की डिलीवरी करनी होती है।

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मधुमेह के उपचार, माँ को मधुमेह होने के कारण जब बच्चे के शरीर में ग्लूकोस की मात्रा ज़्यादा हो, तो डिलीवरी के दौरान बच्चे की हड्डियां भी फ्रैक्चर हो सकती हैं। परन्तु राहत की बात यह है कि समय के साथ यह फ्रैक्चर बिना किसी अतिरिक्त समस्या के ठीक भी हो जाता है। परन्तु जब डिलीवरी की प्रक्रिया चल रही होती है तो ऑक्सीजन की कमी की वजह से बच्चे के मस्तिष्क को भी नुकसान पहुँच सकता है। अगर डिलीवरी के वक़्त बच्चे का आकार सामान्य से कहीं ज़्यादा है तो इस बात की काफी ज़्यादा संभावना है कि महिलाओं के गुप्तांग पर अच्छी खासी चोट लग सकती है। अतः ऐसी स्थिति में उस महिला के लिए यही अच्छा होगा कि वह सीज़ेरियन सेक्शन (cesarean section) की प्रक्रिया का प्रयोग करके बच्चे को जन्म दे।

डायबिटीज का इलाज, इसके अलावा जिन बच्चों की त्वचा में फैट की अतिरिक्त परतें होती हैं, दुर्भाग्य से वे इस चलन को बरकरार रखते हैं और बचपन के सालों में तो वे अधिक वज़न के होते ही हैं, परन्तु वयस्क आयु में आने के बाद भी उनके शरीर से फैट की मात्रा कम नहीं होती। इस स्थिति में आपके बच्चे के ब्लड शुगर का स्तर कम हो जाता है क्योंकि इस समय बच्चे का शरीर इस प्रक्रिया के लिए ज़रूरी अतिरिक्त इन्सुलिन का उत्पादन करता है। जन्म के तुरंत बाद अपने बच्चे को स्तनपान अवश्य करवाएं, जिससे कि विभिन्न बीमारियों से लड़ने के लिए उसे ज़रूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिले।

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